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देवी भागवत पुराण के अनुसार, यदि कोई मनुष्य संसार की माया, मोह और अज्ञान के बंधनों से मुक्त होना चाहता है, तो उसे जगदम्बा मां आदि शक्ति की आराधना करनी चाहिए। मां आदि शक्ति ही इस चराचर जगत की मूल प्रकृति और माया की स्वामिनी हैं। जब वे प्रसन्न होती हैं, तो जीव को अपनी 'योगमाया' के प्रभाव से बाहर निकालकर मोक्ष और परम शांति का मार्ग दिखाती हैं।
मां भगवती ही इस संपूर्ण ब्रह्मांड की चेतना हैं। जब तक जीव उनकी सांसारिक माया के वश में रहता है, तब तक वह जन्म-मरण और सुख-दुख के चक्र में उलझा रहता है लेकिन जैसे ही मां की असीम कृपा होती है, वही माया 'योगमाया' बनकर साधक के भीतर ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का संचार करती है, जिससे मोक्ष का मार्ग स्वतः ही प्रशस्त हो जाता है।
यही महामाया भगवती देवी ज्ञानियों के चित्त को बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती है और उसी के द्वारा सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति होती है।
आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में शारदीय नवरात्रि का आगमन होता है। नवरात्रि के इस पर्व में मां भगवती जगतजननी आदि शक्ति मां जगदंबा की कृपा प्राप्त करने के लिए उनकी सेवा तथा आराधना की जाती है। पावन पर्व नवरात्र में देवी दुर्गा की कृपा, सृष्टि की सभी रचनाओं पर समान रूप से बरसती है।
मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्रकाम्य, ईशित्व और वशित्व ये आठ सिद्धियां होती हैं। देवी पुराण के अनुसार भगवान शिव ने इन्हीं की कृपा से सिद्धियों को प्राप्त किया था। प्राचीन काल में देवताओं और असुरों में पूरे सौ वर्षों तक घोर युद्ध हुआ था। इस युद्ध में देवताओं की सेना परास्त हो गई थी और इस प्रकार सम्पूर्ण देवताओं को जीत महिषासुर इन्द्र बन बैठा था। देवताओं ने अपनी हार का सारा वृत्तान्त भगवान श्रीविष्णु और शंकरजी से कह सुनाया कि 'हे प्रभु! किस प्रकार महिषासुर सूर्य, चन्द्रमा, इन्द्र, अग्नि, वायु, यम, वरुण , तथा अन्य देवताओं के सब अधिकार छीनकर सबका अधिष्ठाता स्वयं बन बैठा है।'
यह सुनकर भगवान श्रीविष्णु और शंकरजी बड़े क्रोधित हुए। तभी भगवान विष्णु और शंकर जी तथा अन्य देवताओं के मुख से मां भगवती का तेजोमय रूप प्रकट हुआ। जिसे सभी ने अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र, दिव्य वस्त्र, उज्ज्वल हार, दिव्य आभूषण भेंट किए और मां का सम्मान किया।
भीषण युद्ध में देवी ने जब पराक्रमी दुरात्मा महिषासुर को मार गिराया और असुरों की सेना को मार दिया तब इन्द्रादि समस्त देवताओं ने सिर तथा शरीर को झुकाकर मां भगवती की स्तुति की।
तब मां भंगवती दुर्गा ने देवताओं को आशीर्वाद देते हुए कहा कि 'हे देवताओं ! तुमने जो मेरी स्तुति की है अथवा ब्रह्माजी ने जो मेरी स्तुति की है, वह मनुष्यों को कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करने वाली है।'
नवरात्र के दौरान मां भगवती को प्रसन्न करने के लिए साधक विभिन्न प्रकार के पूजन करते हैं। नवरात्र में दुर्गा सप्तशती का नियमित पाठ विधि-विधान से किया जाए तो माता बहुत प्रसन्न होती हैं। भगवान श्रीराम ने भी लंका पर चढ़ाई से पूर्व मां भगवती दुर्गा की आश्विन में आने वाले शारदीय नवरात्रि में आराधना कर विजय का वर प्राप्त किया।
तभी से आश्विन मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम 9 दिनों में मां भगवती जगदंबा की आराधना पर्व शारदीय नवरात्रि प्रारम्भ हुआ।
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| देवी दुर्गा कौन हैं और उनकी शक्तियां क्या हैं? |
मां के 'नौ रूप'
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी । तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥ पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ॥ नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः । उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ॥ अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे। विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः ॥
शैलपुत्री - नवरात्र के पहले दिन मां दुर्गा के इस स्वरूप की पूजा होती है। पर्वतराज हिमालय के यहां पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा था।
ब्रह्मचारिणी - मां दुर्गा की नवशक्तियों का यह दूसरा स्वरूप है। यहां ब्रह्म शब्द का अर्थ तपस्या है। ब्रह्मचारिणी अर्थात तप की चारिणी अर्थात तप का आचरण करने वाली। ब्रह्मचारिणी देवी का स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं अत्यंत भव्य है।
चंद्रघंटा - मां दुर्गा की इस तृतीय शक्ति का पूजन नवरात्र के तीसरे दिन किया जाता है। मां का यह स्वरूप शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसीलिए इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है।
कूष्माण्डा- अपनी मन्द हंसी से अण्ड अर्थात ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्माण्डा देवी के नाम से जाना जाता है।
स्कन्दमाता - भगवान स्कन्द की माता होने के कारण मां दुर्गा के इस स्वरूप को स्कन्दमाता कहा जाता है।
कात्यायनी - विश्वप्रसिद्ध ऋषि कात्यायन ने भगवती पराअम्बा की उपासना करते -हुए कठिन तपस्या की। उनकी इच्छा थी कि भगवती उनके घर में पुत्री के रूप में जन्म लें। माता ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। महर्षि कात्यायन ने इनकी पूजा की, इसी कारण से यह देवी कात्यायनी कहलाई।
कालरात्रि- मां दुर्गा की इस सातवीं शक्ति के शरीर का रंग घने अंधकार की भांति काला है, बाल बिखरे हुए, गले में विद्युत की भांति चमकने वाली माला है। मां का यह स्वरूप देखने में अत्यन्त भयानक है किन्तु सदैव शुभ फलदायक है। अत: भक्तों को इनसे भयभीत नहीं होना चाहिए।
महागौरी - मां आदि शक्ति दुर्गा की यह आठवीं शक्ति हैं। पार्वती रूप में इन्होंने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। इनकी तपस्या से जब भगवान शिव प्रसन्न हुए, तब इनका शरीर विद्युत के समान अत्यन्त कांतिमान गौर हो गया, तभी से इनका नाम गौरी पड़ा।
सिद्धिदात्री - मां भगवती दुर्गा की यह नवम शक्ति है। सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली माता इन्हीं को माना गया है।




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