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| योगमाया से प्रकट हुए 'भगवान श्रीकृष्ण |
उनका अत्यंत पुण्यप्रद प्राकट्य भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में हुआ जिसे हम श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर्व के रूप में मनाते हैं। ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर पृथ्वी का अत्याचारियों से भार उतारने तथा अपने भक्तों को सुख प्रदान करने के लिए कंस के कारागार में वसुदेव-देवकी के यहां आनंदकंद श्रीभगवान प्रकट हुए।
वसुदेव जी ने देखा, उनके सामने एक अद्भुत बालक है। उसके नेत्र कमल के समान कोमल और विशाल हैं। चार सुंदर हाथों में शंख, गदा, चक्र और कमल लिए हुए हैं। वक्षः स्थल पर श्रीवत्स का चिह्न- अत्यंत सुन्दर सुवर्णमयी रेखा है। गले में कौस्तुभमणि झिलमिला रही है। वर्षाकालीन मेघ के समान परम सुंदर श्यामल शरीर पर मनोहर पीताम्बर फहरा रहा है।
जब वसुदेवजी ने देखा कि मेरे पुत्र के रूप में तो स्वयं भगवान् ही आए हैं, तब पहले तो उन्हें असीम आश्चर्य हुआ; फिर आनन्द से उनकी आंखें खिल उठीं। उनका रोम-रोम परमानन्द में मग्न हो गया। कंस के भय से देवकी भगवान से प्रार्थना करते हुए बोलीं, "आपका यह रूप अलौकिक है। आप शंख, चक्र, गदा और कमल की शोभा से युक्त अपना यह चतुर्भुज रूप छिपा लीजिए।"
तब श्रीभगवान ने कहा, "देवि ! स्वायंभुव मन्वंतर में जब तुम्हारा पहला जन्म हुआ, उस समय तुम्हारा नाम था पृश्नि और ये वसुदेव सुतपा नामक प्रजापति थे। तुम दोनों ने कठोर तपस्या, श्रद्धा और प्रेममयी भक्ति से अपने हृदय में नित्य-निरंतर मेरी भावना की थी। तब तुम दोनों ने मेरे जैसा पुत्र मांगा।"
वसुदेव जी कंस के भग्न से भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप को यमुना पार कर गोकुल ले गए। वहां उन्होंने नंद भवन में यशोदा जी के पास श्रीकृष्ण को सुला दिया और उनके स्थान पर वहां जन्मी कन्या को लेकर मथुरा लौट आए।
सर्वशक्तिमान, चराचर जगत के कल्याण के लिए निराकार स्वरूप होते हुए भक्ति तथा प्रेमवश साकार रूप धारण करने वाले श्रीहरि भगवान ने श्री कृष्ण के बाल रूप में सुंदर एवं मधुर लीलाएं कीं। इन लीलाओं का इतना प्रभाव है कि इनके श्रवण, पठन से अंतःकरण शीघ्र अतिशीघ्र शुद्ध हो जाता है।
भगवान ने अपनी बाललीला में कंस द्वारा भेजे गए राक्षसों पूतना, तृणावर्त, बकासुर, अघासुर का नाश कर उनको मुक्ति प्रदान की तथा कंस का वध कर मथुरा नगरी को भयमुक्त किया। कुंती-पुत्र अर्थात पांडवों की रक्षा की, कौरवों का नाश किया। इस प्रकार भगवान श्री कृष्ण जी ने संसार में अपनी लीलाएं रची।
अघासुर जैसे राक्षसों को मोक्ष प्राप्त हुआ देख ब्रह्मा जी को अत्यंत आश्चर्य हुआ। जब उन्होंने बाल कृष्ण भगवान की परीक्षा लेने के लिए ग्वाल बाल और बछड़ों को चुरा लिया तब सब ग्वाल बालों और बछड़ों का स्वरूप धारण कर भगवान श्री कृष्ण ने ब्रह्मा जी के विश्वकर्ता होने के अभिमान को नष्ट किया। तब ब्रह्मा जी ने उनकी स्तुति करते हुए कहा कि आपकी महिमा का ज्ञान तो बड़ा कठिन है। आप अनंत आदि पुरुष परमात्मा हैं और मेरे जैसे बड़े-बड़े मायावी भी आपकी माया के चक्र में हैं। मैं अजन्मा जगतकर्ता हूं, इस मायाकृत मोह के घने अंधकार से मैं भ्रमित था। मेरा अपराध क्षमा कीजिए।
एक समय रात्रि के समय यमुना जी में स्नान करने पर नंद जी को वरुण के सेवक पकड़ कर ले गए। तब भगवान श्री कृष्ण उन्हें वरुण लोक से वापस ले आए। इसी प्रकार गुरु सांदीपनी जी के आश्रम में शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात उनके मृत पुत्र को यमलोक से वापस लाकर अपने गुरु को गुरु-दक्षिणा दी।
महाभारत के युद्ध में कर्त्तव्य मार्ग से विमुख हुए अर्जुन को भगवान श्री कृष्ण ने समस्त वेद, उपनिषदों से सारगर्भित ज्ञान को श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में प्रदान किया और अर्जुन को अपने विश्वरूप परमात्मा के रूप में दर्शन कराए।
भगवान ने अर्जुन को धर्ममय उपदेश देते हुए कहा कि मनुष्य आसक्ति से रहित होकर कर्त्तव्य कर्म करता हुआ परमात्मा को प्राप्त कर लेता है। श्रेष्ठ पुरुष का श्रेष्ठ आचरण ही समस्त मानव जाति के लिए प्रेरणा होता है जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न ही किसी की आकांक्षा करता है, वह कर्मयोगी, सदा संन्यासी ही समझने योग्य है।
भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य उपदेश आज सम्पूर्ण प्राणीमात्र के लिए संजीवनी का कार्य कर रहे हैं। भगवान ने श्री गीता जी के माध्यम से अंधकार में भटक रहे मनुष्यों को गीता ज्ञान रूपी प्रकाश प्रदान किया। भगवान श्री कृष्ण के चरण कमलों का स्मरण हृदय को शुद्ध करता है तथा परमात्मा के प्रति भक्ति प्रदान करता है, साथ ही बोध और वैराग्य से समृद्ध ज्ञान भी प्रदान करता है।



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