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कला, सौंदर्य और संस्कृति के लिए विश्वविख्यात पैरिस के बुसी-सेंट जॉर्जेस में बना फ्रांस का पहला - परम्परागत हिन्दू मंदिर केवल भारतीय स्थापत्य का अद्भुत नमूना नहीं है, यह भारत और फ्रांस की दो सुंदर सांस्कृतिक धाराओं के मिलन का जीवंत प्रतीक है।
7 जुलाई, 1970 का वह दिन था। लंदन से मुंबई की ओर जा रहा एक विमान कुछ समय के लिए पैरिस के ओरली एयरपोर्ट पर रुका। यात्रियों के लिए यह शायद यात्रा का एक सामान्य पड़ाव था परंतु उस समय किसी को क्या पता था कि इसी छोटे-से ठहराव में इतिहास का एक अदृश्य बीज बोया जा रहा है।
उस विमान में विराजमान थे स्वामी योगींजी महाराज, जो लंदन में हिन्दू मंदिर की प्रतिष्ठा कर भारत जा रहे थे।. तभी इस दूरदर्शी गुरु ने अपने दो शिष्यों, प्रमुख स्वामी महाराज और महंत स्वामी महाराज से विमान से नीचे उतरने का आग्रह किया। इस तरह पहली बार दो स्वामिनारायण परंपरा के संत हाथों में स्वामिनारायण भगवान की चल मूर्ति लेकर फ्रांस की धरती पर उतरे। दोनों शिष्य गुरु की आज्ञा के अनुसार नीचे गए, ठहरकर प्रार्थना की और वापस विमान में आए।
अब गुरु योगीजी महाराज ने अपना संकल्प व्यक्त किया, "एक दिन पैरिस में एक सुंदर मंदिर बनेगा।"
उस क्षण न कोई मंदिर की भूमि थी, न निर्माण की योजना, न शिल्पकारों का समूह और न ही कोई स्थापत्य का नक्शा। था तो केवल एक संत का दिव्य संकल्प और भगवान पर अटूट विश्वास ।
समय बीतता गया। वर्ष दशकों में बदल गए लेकिन आज, वह दिव्य संकल्प काल के आवरण को चीरकर फ्रांस की धरती पर अमिट शिलालेख बनकर तैयार खड़ा है। इस पारंपरिक पाषाण निर्मित मंदिर की विशेषता यह है कि यह उपासना स्थल होने के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, कला, शिक्षा और संवाद का समग्र केंद्र है।
पहले पारम्परिक मंदिर से तात्पर्य फ्रांस की धरती पर बनाया गया सबसे पहला ऐसा हिंदू मंदिर है जिसका निर्माण पारंपरिक हिंदू मंदिर वास्तुकला और धार्मिक परंपराओं के अनुसार किया गया है।
पैरिस के पूर्वी उपनगर 'बुसी-सेंट जॉर्जेस' में 'एली मैडम द मोंतेस्पां, 77600' में स्थित लगभग 5,000 वर्गमीटर के फैले इस परिसर में दो प्रमुख आयाम हैं-ऊपरी तल पर पारम्परिक मंदिर और उसके आधार में हवेली के रूप में सांस्कृतिक केंद्र ।
5 शिखर, 10 विशाल गुंबद, 20 बारीक कारीगरी से युक्त महाकाय स्तंभ, 120 गवाक्ष, 49 चरित्र शिल्प पैनल, और 4 सुसज्जित छतरियां मंदिर की पारंपरिक भारतीय स्थापत्य पहचान को उजागर करते हैं। इसके अतिरिक्त गर्भगृह, प्रार्थना मंडप और सभामंडप इसकी गहरी अध्यात्म दृष्टि को उजागर करते हैं ।
उल्लेखनीय है कि ग्रीस, भारत, इटली और वियतनाम से प्राप्त विभिन्न प्रकार के संगमरमर तथा भारत के ग्वालियर के बलुआ पत्थर का उपयोग इस निर्माण को एक वैश्विक सहयोग का स्वरूप देता है। भारत में कुशल शिल्पकारों ने अपने हाथों से इन पाषाण खंडों को तराशकर उन पर हिन्दू शास्त्रीय शिल्पों का टंकण किया है।
प्राचीन 'मारू गुर्जर शैली' में बनी विशाल हवेली में सभागृह, कक्षाएं, प्रदर्शनी स्थल, खेलकक्ष, कार्यालय और बहुउद्देशीय सुविधाएं हैं। इस प्रकार यह पूरा परिसर एक साथ देवदर्शन, ज्ञान का केंद्र, संस्कृति का संग्रहालय और मानव-मिलन का स्थल बना है।
यह परिसर 'एस्प्लानेड दे रेलिजियों ए दे कुल्त्यूर' क्षेत्र में है, जहां विभिन्न धार्मिक परंपराओं के उपासना-स्थलों का साथ-साथ होना स्वयं परस्पर सम्मान और सह-अस्तित्व का सुंदर संदेश देता है।
2 से 14 सितम्बर तक 'फैस्टिवल ऑफ कल्चर' इसी व्यापक दृष्टि का उत्सव होगा। वैदिक महायज्ञ, पालखी यात्रा, सीन नदी पर जल यात्रा, पैरिस के प्रसिद्ध सीमाचिह्नों के निकट से गुजरने वाली नगरयात्रा और विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम, ये सभी केवल उत्सव नहीं, बल्कि संस्कृतियों के मिलन के अवसर होंगे। 6 सितम्बर को महंत स्वामी महाराज द्वारा मूर्ति प्रतिष्ठा और लोकार्पण विधि इस ऐतिहासिक यात्रा का एक चरम क्षण बनेगी।
मंदिर के निर्माण में संतों और स्वयंसेवकों का समर्पण अविस्मरणीय है। किसी ने पत्थर तराशे, किसी ने व्यवस्था संभाली, किसी ने भोजन बनाया पर सबने मिलकर अपने हृदय का एक अंश इस मंदिर में रख दिया। पैरिस में बना यह मंदिर केवल भारत की पहचान नहीं, बल्कि उस विश्वास का प्रतीक है कि जब संस्कृतियां एक-दूसरे का सम्मान करती हैं, तब सीमाएं मिटती हैं और मानवता का एक नया मंदिर निर्मित होता है।


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