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| यतीन्द्रनाथ दास' अनशन से लिखी शहादत की कहानी |
भारत को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र कड़ाने के लिए देश के हजारों गुवानों ने अपना जीवन स्वतंत्रता संधाम के हवन कुंड में आहुति की तरह अर्पित कर दिया। इन्हों वीर कांतिकारियों में एक थे यतीन्द्रनाथ दास, जिन्हें जतीन्द्रनाथ दास के नाम से भी जाना जाता है। वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख क्रांतिकारी और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (एच एम आर ए) के सदस्य थे।
जेल में क्रांतिकारियों के साथ समान व्यवहार और बेहतर सुविधाओं की मांग को लेकर उन्होंने लंबी भूख हड़ताल की और 13 सितम्बर 1929 को लाहौर सेंट्रल जेल में शहीद हो गए।
प्राम्भिक जीवन और असहयोग आंदोलन
यतीन्द्र नाथ दास का जन्म 27 अक्तूबर 1904 को कलकत्ता के एक बंगाली परिवार में हुआ था।
उनके पिता का नाम चौकम बिहारी दाम और माता का नाम सुहासिनी देवी था। जब वे केवल 9 वर्ष के थे. उनकी माता का निधन हो गया। इसके बाद उनका पालन पोषण पिता के संरक्षण में हुआ। वर्ष 1920 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की।
इसी दौरान महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया। यतीन्द्रनाथ भी इस आंदोलन से जुड़ गए। विदेशी कपड़ों की दुकानों के सामने धरना देने के कारण उन्हें गिरफ्तार कर महीने की सजा सुनाई गई।
चौरी-चौरा की घटना के बाद गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया। इसके बाद यतीन्द्रनाथ को भी अन्य क्रांतिकारियों के साथ रिहा कर दिया गया।
क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका
रिहाई के बाद यतीन्द्रनाथ ने कॉलेज में पढ़ाई जारी रखी। इसी दौरान उनकी मुलाकात प्रसिद्ध क्रांतिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल से हुई। वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़ गए और शीघ्र ही क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाने लगे। उन्होंने बम बनाने का प्रशिक्षण भी प्राप्त किया।
1925 में उन्हें दक्षिणेश्वर बम कांड और काकोरी कांड से जुड़े मामलों में गिरफ्तार कर मेमनसिंह जेल भेज दिया गया। वहां राजनीतिक कैदियों के साथ होने वाले दुव्र्व्यवहार के विरोध में उन्होंने भूख हड़ताल शुरू की। 21 दिन तक चले इस अनशन के बाद जेल प्रशासन को उनकी मांगों के आगे झुकना पड़ा और उन्हें रिहा कर दिया गया।
भगत सिंह से संपर्क
1928 में बालकता कांग्रेस के दौरान यतीन्द्रनाथ कांग्रेस सेवादल में नेताजी सुभाषचंद्र बोस के सहायक रहे। इसी वर्ष उनकी मुलाकात भगत सिंह से हुई जिनके आग्रह पर उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए बम तैयार करने में सहयोग किया।
8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय अमेम्बली में बम फेंका था। 14 जून 1929 को यतीन्द्रनाथ गिरफ्तार कर लिए गए और उन पर लाहौर षड्यंत्र केस में मुकदमा चलाया गया।
63 दिनों का ऐतिहासिक अनशन
जेल में भारतीय क्रांतिकारियों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाता था। उन्हें अचा भोजन, उचित वस्त्र, पढ़ने की सामग्री और लिखने के लिए कागज तक उपलब्ध नहीं कराया जाता था।
इसके विरोध में भगत सिह, बटुकेश्वर दत्त और अन्य क्रांतिकारियों ने 13 जुलाई 1929 से भूख हड़ताल शुरू की। बाद में यतीन्द्रनाथ भी इस आंदोलन में शामिल हो गए।
जेल प्रशासन ने अनशन तुड़वाने के लिए उन्हें जबरन दूध पिलाने का प्रयास किया। इस दौरान उनकी हालत अत्यंत खराब हो गई और उन्हें निमोनिया हो गया।
इसके बावजूद उन्होंने अनशन नहीं तोड़ा और अपने साथियों से अलग होने से भी इंकार कर दिया।
13 सितंबर 1929 को अनशन के 63वें दिन यतीन्द्रनाथ दास ने अंतिम सांस ली। उनके भाई किरणचंद्र दास ने उनका सिर अपनी गोद में रखा।
क्रांतिकारी विजय सिन्हा ने उनका प्रिय गीत 'एकला चलो रे' और फिर 'बंदे मातरम्' गाया। गीत समाप्त होते ही इस वीर क्रांतिकारी का सिर एक ओर लुढ़क गया।
यतींद्रनाथ दास की शहादत ने पूरे देश को झकझोर दिया। उनके पार्थिव शरीर को कलकत्ता ले जाया गया, जहां अंतिम दर्शन के लिए भारी संख्या में लोग उमड़े। उनको शहादत भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में साहस, संकल्प और देश के प्रति समर्पण का अमिट उदाहरण है।
| उनके सम्मान में जारी की गई पोस्टल स्टैम्प |



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