कुल्पना कीजिए, आज से लगभग डेढ़ हजार साल पहले भारत में एक ऐसा विशाल शिक्षा केंद्र था, जहां दूर-दूर के देशों से विद्यार्थी ज्ञान प्राप्त करने आते थे।
यह था नालंदा महाविहार, जो प्राचीन भारत की महानतम शिक्षण संस्थाओं में गिना जाता है। वर्तमान बिहार में स्थित नालंदा का विकास गुप्त काल में, लगभग 5वीं शताब्दी ईस्वी. में हुआ और कई शताब्दियों तक यह ज्ञान, विचार-विमर्श और शोध का प्रमुख केंद्र बना रहा।
नालंदा की सबसे खास बात थी कि यहां शिक्षा केवल धार्मिक विषयों तक सीमित नहीं थी। यहां बौद्ध दर्शन, वेद, 'व्याकरण, तर्कशास्त्र, चिकित्सा, गणित, खगोलशास्त्र, दर्शन, राजनीति और विभिन्न कलाओं का अध्ययन कराया जाता था। विद्यार्थियों को अलग-अलग विचारधाराओं और दर्शनों को समझने तथा उन पर तर्क-वितर्क करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता था।
कठिन थी प्रवेश परीक्षा
नालंदा में प्रवेश पाना आसान नहीं था। प्रवेश के इच्छुक विद्यार्थियों को विद्वान आचार्यों के प्रश्नों का उत्तर देकर अपनी योग्यता साबित करनी पड़ती थी।
चीनी यात्री हेनसांग के विवरण से पता चलता है कि नालंदा में बड़ी संख्या में शिक्षक और विद्यार्थी रहते थे तथा यहां प्रतिदिन विभिन्न विषयों पर चुचर्चा और वाद-विवाद होते थे। शिक्षा का माध्यम मुख्यतः संस्कृत था।
कौन थे नालंदा से जुड़े प्रसिद्ध विद्वान ?
नालंदा में अपने समय के अनेक महान विद्वानों ने अध्यापन किया। इनमें नागार्जुन, धर्मपाल, दिग्नाग, धर्मकीर्ति, आर्यदेव, वसुबन्धु और शीलभद्र जैसे प्रसिद्ध नाम शामिल हैं।
विशेष रूप से आचार्य शीलभद्र नालंदा के प्रमुख आचार्य और हेनसांग के गुरु थे। ह्वेनसांग ने उनसे योगशास्त्र और बौद्ध दर्शन का अध्ययन किया था।
प्रसिद्ध विद्यार्थी
नालंदा की ख्याति भारत तक सीमित नहीं थी। चीन के प्रसिद्ध यात्री और विद्वान हेनसांग ने यहां अध्ययन किया और बाद में अपने यात्रा-वृत्तांत में नालंदा के बारे में विस्तार से लिखा। एक अन्य चीनी विद्वान इत्सिग ने भी यहीं अध्ययन किया और नालंदा की शिक्षा व्यवस्था तथा बौद्ध परंपराओं का वर्णन किया। इनके विवरण आज प्राचीन नालंदा को समझने के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
नालंदा से जुड़े विद्वानों में आर्यभट का नाम भी अक्सर लिया जाता है, हालांकि उनके नालंदा में. शिक्षक होने की बात को लेकर इतिहासकारों के बीच सहमति नहीं है।
ज्ञान का विशाल संसार
नालंदा में शिक्षा का तरीका भी अनोखा था। केवल किताबें मढ़ना ही उद्देश्य नहीं था। प्रश्न पूछना, तर्क करना, चर्चा और वाद-विवाद सीखने के महत्वपूर्ण साधन थे। विद्यार्थी अलग-अलग विषयों और विचारधाराओं पर अपने विचार प्रस्तुत करते थे। यही कारण था कि नालंदा केवल एक विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि स्वतंत्र चितन की प्रयोगशाला जैसा था।
आज नालंदा के खंडहर हमें भारत की उस गौरवशाली परंपरा की बाद दिलातें हैं, जिसमें ज्ञान को सीमाओं में नहीं बांधा जाता था। दुनिया के विभिन्न हिस्सों से आए विद्यार्थियों और विद्वानों ने यहां विचारों का आदान-प्रदान किया। नालंदा की सबसे बड़ी विरासत यही है ज्ञान जितना बांटा जाए, उतना ही बढ़ता है।


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