
'तीज' नवविवाहित स्त्रियों द्वारा पति की लम्बी आयु के लिए किया जाने वाला व्रत है। 'तीज' तीन प्रकार की होती है- 'हरियाली तीज'. 'कजरी तीज' और 'हरतालिका तीज'। इन तीनों में काफी अंतर है और अलग-अलग ढंग से पूजा की जाती है।
'हरियाली तीज' सावन (श्रावण) मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को आती है। यह पर्व चारों तरफ हरियाली और मानसून के स्वागत का प्रतीक है। महिलाएं हरे रंग के वस्त्र पहनती हैं, मेहंदी लगाती हैं, झूला झूलती हैं और शिव-पार्वती की पूजा करती हैं।
'कजरी तीज' में सभी विवाहित औरतें इकट्ठी होकर नीम के पेड़ की पूजा करती हैं और खुशी के गीत गाती हैं। दूध-दही और फलों के साथ 'कजरी तीज' की पूजा की जाती है। यह सावन के बाद भाद्रपद (भादों) मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है।
'हरतालिका तीज' में हर महिला उपवास रखती है जो लगातार तीन दिन तक चलता है। दूसरे दिन के व्रत में पानी तक नहीं पिया जाता। यह भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को, गणेश चतुर्थी से ठीक एक दिन पहले आती है।
इन सभी तीजों में 'हरियाली तीज' को औरतें बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाती हैं जो इस बार 15 अगस्त को है। यह त्योहार ब्रज क्षेत्र, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब तथा हरियाणा आदि प्रदेशों में विशेष धूमधाम से मनाया जाता है। ब्रज क्षेत्र में जहां यह 'तीज' कुंवारी कन्याओं का त्योहार है, तो राजस्थान में यह कुंवारी कन्याओं एवं सौभाग्यवती महिलाओं दोनों का उत्सव है।
संस्कृति, समर्पण और सामाजिक एकता का प्रतीक उत्सव
'तीज' का पर्व रंग-बिरंगे उत्सवों, भक्ति और सामाजिक एकता का प्रतीक है। इस दिन महिलाएं विशेष रूप से तैयार होती हैं और विभिन्न रीति-रिवाज निभाती हैं।
'तीज' के अवसर पर महिलाएं, समूह में एकत्र होकर लोकगीत गाती और नृत्य करती हैं। ये गीत प्रायः माता पार्वती, शिव और वर्षा ऋतु की सुंदरता से संबंधित होते हैं। झूला झूलना भी इस पर्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इस दिन मायके से बेटी को उपहार, घेवर जैसी मिठाइयां और नए वस्त्र भेजे जाते हैं जिसे 'सिंधारा' कहते हैं। उसके पीछे ससुराल गई बेटी को स्नेहपूर्वक याद करने, उसके वैवाहिक जीवन की शुभकामनाएं देने का भाव निहित होता है।
'तीज' केवल धार्मिक पर्व ही नहीं बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है- यह पर्व महिलाओं को एक साथ आने और अपनी खुशियों, अनुभवों और भावनाओं को सांझा करने का अवसर देता है। यह सामाजिक बंधनों को मजबूत करता है।
पंजाब और हरियाणा में तो 'हरियाली तीज' का उत्साह देखने लायक होता है, जिसमें झूला और मेहंदी की रस्में प्रमुख हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से 'तीज' की शुभकामनाएं और उत्सव की तस्वीरें सांझा की जाती हैं।
'तीज' का पर्व भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति, प्रेम और भक्ति का प्रतीक है। यह न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता को भी बढ़ावा देता है। यह पर्व महिलाओं की अपनी पहचान, रचनात्मकता और सामुदायिक भावना को व्यक्त करने का अवसर है।
आधुनिक युग में भी 'तीज' का महत्व बना हुआ है, क्योंकि यह परंपरा और आधुनिकता का एक सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है।
नारी शक्ति और सांस्कृतिक चेतना
'हरतालिका तीज', भारतीय नारी के उस रूप को सामने लाता है, जो सहनशील तो है, लेकिन कमजोर नहीं। जो त्याग में सक्षम है, परंतु अपनी इच्छाओं की पूर्ति हेतु संकल्पबद्ध भी। 'यह पर्व उस स्त्री की कथा कहता है, जो प्रेम को भिक्षा नहीं, अधिकार स्वरूप चाहती है और उसके लिए तप करने से भी नहीं हिचकती।"
आज के संदर्भ में, जब समाज तेजी से बदल रहा है, स्त्री के लिए यह पर्व आत्मचिंतन का अवसर भी है कि क्या हम केवल परम्पराओं का अनुसरण कर रहे हैं या उनके पीछे गहरे आध्यात्मिक अर्थ को भी समझ रहे हैं?
आधुनिक जीवनशैली में 'हरतालिका तीज' को केवल श्रृंगार और दिखावे तक सीमित कर देना, इसके आध्यात्मिक स्वरूप के साथ अन्याय है। यदि हम इस पर्व को आत्मशुद्धि, ध्यान और आंतरिक जागृति के अवसर के रूप में लें तो यह हमें केवल सांसारिक सुख की नहीं, बल्कि आध्यात्मिक आनंद की प्राप्ति भी करा सकता है।
यह हमें सिखाता है कि नारी चाहे तो अपने संकल्प से ब्रह्म को भी मोड़ सकती है। जब वह शिव को पाने के लिए अपने अहं, आराम और इच्छाओं का त्याग कर सकती है तो इससे हम सभी को अपने जीवन में किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आत्मसंयम और साधना की राह पर चलने की प्रेरणा मिलती है।


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