Image Source: Googleदीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा Govardhan Puja की जाती है। लोग इसे अन्नकूट के नाम से भी जानते हैं। इस त्यौहार का भारतीय लोकजीवन में बहुत महत्व है। इस पर्व में प्रकृति के साथ मानव का सीधा सम्बन्ध दिखाई देता है। इस पर्व की अपनी मान्यता और लोककथा है। गोवर्धन पूजा में गोधन अर्थात गायों की पूजा की जाती है।
दीपावली के अगले दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को' गोवर्धन पूजन और गौ-पूजन के साथ-साथ अन्नकूट पर्व भी मनाया जाता है। इस दिन प्रातः नहा-धोकर, स्वच्छ वस्त्र धारण कर अपने इष्टों का ध्यान करते हैं। इसके पश्चात अपने घर या फिर देव स्थान के मुख्य द्वार के सामने गोबर से गोवर्धन बनाना शुरू किया जाता है। इसे छोटे पेड़, वृक्ष की शाखाओं एवं पुष्पों से सजाया जाता है। पूजन करते समय यह श्लोक कहा जाता है :
यह गोवर्धन पूजा Govardhan Puja का दिन (प्रतिपदा) साल में साढ़े तीन शुभ मुहूर्तों में से एक माना जाता है। किसी भी काम की शुभशुरुआत इस दिन की जा सकती है। आर्थिक दृष्टि से व्यापारी इस दिन से साल की नई शुरुआत मानते हैं।
लक्ष्मी प्राप्ति की कामना करते हुए हिसाब-किताबों की हल्दी, कुमकुम, फूल अर्पण कर पूजा की जाती है। इस शुभ दिन से नई कापियों में हिसाब लिखना शुरू किया जाता है।
पौराणिक कथा
गोवर्धन पर्वत की पूजा के बारे में एक कहानी कही जाती है जो इस प्रकार है:
भगवान श्री कृष्ण अपने सखा और गोप-ग्वालों के साथ गाएं चराते हुए गोवर्धन पर्वत पर पहुंचे तो देखा कि वहां गोपियां 56 प्रकार के भोजन रखकर बड़े उत्साह से नाच-गाकर उत्सव मना रही हैं।।
श्रीकृष्ण के पूछने पर उन्होंने बताया कि आज वृत्रासुर को मारने वाले तथा मेघों व देवों के स्वामी इंद्र का पूजन होता है। इसे इंद्रोज यःञ्ज कहते हैं। इससे प्रसन्न होकर ब्रज में वर्षा होती है, अन्न पैदा होता है।
श्रीकृष्ण ने कहा कि इंद्र में क्या शक्ति है, उससे अधिक शक्तिशाली तो हमारा गोवर्धन पर्वत है। इसके कारण वर्षा होती है। अतः हमें इंद्र से भी बलवान गोवर्धन की पूजा करनी चाहिए। काफी विवाद के बाद श्रीकृष्ण की यह बात मानी गई तथा ब्रज में इंद्र के स्थान पर गोवर्धन की पूजा की तैयारियां शुरू हो गईं।
सभी गोप-ग्वाल अपने-अपने घरों से पकवान लाकर गोवर्धन की तराई में श्रीकृष्ण द्वारा बताई विधि से पूजन करने लगे। श्रीकृष्ण द्वारा सभी पकवान चखने पर ब्रजवासी खुद को धन्य समझने लगे। नारद मुनि भी यहां इंद्रोज यज्ञ देखने पहुंच गए थे।
ब्रजवासी इंद्रोज बंद कर के बलवान गोवर्धन की पूजा कर रहे हैं, यह बात इंद्र तक नारद मुनि के जरिए पहुंच गई और इंद्र को नारद मुनि ने यह कहकर और भी डरा दिया कि उनके राज्य पर आक्रमण करके इंद्रासन पर भी अधिकार शायद श्रीकृष्ण कर लें।
इंद्र गुस्से में लाल-पीले होने लगे। उन्होंने मेघों को आदेश दिया कि वे गोकुल में जा कर प्रलय पैदा कर दें। ब्रजभूमि में मूसलाधार बरसात होने लगी। बाल-ग्वाल भयभीत हो उठे। श्रीकृष्ण की शरण में पहुंचते ही उन्होंने सभी को गोवर्धन पर्वत की शरण में चलने को कहा कि वही सब की रक्षा करेंगे।
जब सब गोवर्धन पर्वत की तराई मे पहुंचे तो श्रीकृष्ण ने गोवर्धन को अपनी कनिष्ठा अंगुली पर उठाकर छाता-सा तान दिया और सभी को मूसलाधार वृष्टि से बचाया।
सुदर्शन चक्र के प्रभाव से ब्रजवासियों पर एक बूंद भी जल नहीं गिरा। यह चमत्कार देखकर इंद्रदेव को अपनी गलती पर पश्चाताप हुआ और वह श्रीकृष्ण से क्षमायाचना करने लगे। सात दिन बाद श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत नीचे रखा और ब्रजवासियों को प्रतिवर्ष गोवर्धन पूजा तथा अन्नकूट का पर्व मनाने को कहा। तभी से यह पर्व के रूप में प्रचलित है।
गोवर्धन पूजा Govardhan Puja पूजा विधि
गोवर्धन पूजा Govardhan Puja के साथ-साथ गौ-पूजन की भी तैयारी आरम्भ हो जाती है। सुबह होते होते ही गायों को सहलाना भुलाना, उन्हें विभिन्न अलंकारों से सजाना। कभी-कभी उनके मेहंदी भी लगा दी जाती है। उनका श्रृंगार होने के बाद उनका गंध, अक्षत और फूल अर्पण का पूजन किया जाता है। उनके पैर धो कर उनकी प्रदक्षिणा ली जाती है।
लक्ष्मीर्या लोक पालानाम् धेनुस्र्पेण संस्थिता ।
मृतं वहति यज्ञार्थे मम पापं व्यपौहतु ॥
कह कर नैवेद्य अर्पित करते हैं। नैवेद्य में मिष्ठान का महत्वपूर्ण स्थान होता है, जो गायों को खिलाया जाता है। इस गोबर से घर-आंगन को लीपा जाना शुभहोता है।
गाय मानव को अपना सर्वस्व देती है, उसका दूध, गोबर, गोमूत्र सब कुछ उपयोगी है। ऐसी हमारे लिए महत्वपूर्ण गाय का उपकार मानते हुए उसके प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए, इस भावना से गौ-पूजन किया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गाय का महत्व बताया और समझाया कि इस कारण गोवर्धन और गायों के पूजन का इस पर्व में विशेष महत्व है।
अन्नकूट महोत्सव
भगवान विष्णु अथवा उनके अवतार व अपने इष्ट देवता का इस दिन विभिन्न प्रकार के पकवान बनाकर, रंगोली सजा कर, पके हुए चावलों को पर्वताकार अर्पित कर के पूजन किया जाता है। इसे छप्पन भोग की संज्ञा भी दी गई है। तरह-तरह के चावल के साथ गेहूं के पकवान, विभिन्न सब्जियां रखी जाती हैं। दूध एवं खोए की मिठाइयां, जलेबी, लड्डू आदि तैयार किए जाते हैं। साथ ही विभिन्न फलों को भोग में सम्मिलित किया जाता है। फिर इस महाप्रसाद को भोजन के रूप में ग्रहण किया जाता है।
पौराणिक दृष्टि से चूंकि श्री कृष्ण ने इंद्र का मान-मर्दन किया था, अतः इंद्र के स्थान पर श्री कृष्ण के पूजन का विशेष महत्व है। कहते हैं कि इस पर्व का अनुष्ठान करने से भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह दिन पवित्र होने के बावजूद इस दिन चंद्रदर्शन वर्जित माना गया है।
मान्यता है कि इस दिन शाम को मार्गपाली (एक प्रकार का स्तंभ जिसे रास्ते के रक्षक के रूप में स्थापित किया जाता था और इसकी पूजा की जाती थी। और राजा बलि की पूजा करने तथा मार्गपाली के वंदनबार के नीचे होकर निकलने से सभी प्रकार की सुख-शांति रहती है तथा कई रोग दूर हो जाते हैं।
अन्नकूट प्रसाद क्या है?
यह प्रसाद भगवान कृष्ण को उनकी सुरक्षा के लिए धन्यवाद देने और प्रकृति की प्रचुरता का सम्मान करने के लिए चढ़ाया जाता है। अन्नकूट में अक्सर 56 से ज़्यादा व्यंजन शामिल होते हैं, जिन्हें छप्पन भोग कहा जाता है, जो समृद्धि और कृतज्ञता का प्रतीक है। बाद में इन व्यंजनों को प्रसाद के रूप में बाँटा जाता है, जो सभी को साझा करने और सामुदायिक भावना का महत्व समझाता है
गोवर्धन पूजा की आपको हार्दिक शुभकामनाएं। योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण जी की कृपा एवं आशीर्वाद से सभी का कल्याण हो एवं चारों ओर सुख-समृद्धि का वास हो, ऐसी कामना करता हूँ।
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