
देवउठनी एकादशी Dev Uthani Ekadashi जिसे प्रबोधिनी एकादशी Prabodhini Ekadashi भी कहा जाता है, भगवान विष्णु के क्षीरसागर (ब्रह्मांडीय महासागर) में चातुर्मास का अंत होता है, जिस दौरान भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं। इसी कारण से इसे 'देवों की नींद से जागने वाली एकादशी' भी कहा जाता है। इस वर्ष यह 1 नवम्बर को मनाई जाएगी।
इस दिन का आध्यात्मिक महत्व बहुत अधिक है, क्योंकि यह भगवान विष्णु के जागरण और विवाह, गृहप्रवेश व धार्मिक अनुष्ठानों जैसे शुभकार्यों की शुरुआत की प्रतीक है, जो चातुर्मास काल के दौरान रुके हुए थे। भक्त इस पवित्र दिन | व्रत रखते हैं, पूजा करते हैं और भगवान विष्णु तथा देवी लक्ष्मी की प्रार्थना करते हैं।
देवोत्थान एकादशी व्रत विधि
देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की आराधना के साथ व्रत करना अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन श्रद्धा और भक्ति भाव से पूजा अर्चना करें तथा देवउठनी एकादशी की व्रत कथा का पाठ या श्रवण अवश्य करें। ऐसा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
एकादशी व्रत: देवोत्थान एकादशी व्रत पूरे दिन उपवास रखकर मनाया जाता है। भक्त अनाज, चावल और दाल का सेवन नहीं करते हैं। कुछ लोग स्वयं को स्वस्थ रखने के लिए फल, दूध या जल ग्रहण कर सकते हैं। व्रत का पारण: द्वादशी (12वें चंद्र दिवस) पर भगवान विष्णु की पूजा करने के बाद व्रत का समापन किया जाता है।
देवउठनी एकादशी की संपूर्ण पूजा विधि
देवउठनी एकादशी के दिन साधक को प्रात:काल सूर्योदय से पहले उठकर स्नान-ध्यान करना चाहिए. तन और मन से पवित्र होने के बाद शुभ मुहूर्त में अपने पूजा स्थान या फिर घर के ईशान कोण में साफ-सफाई करने के बाद जमीन पर श्री हरि के चरण चिन्ह या फिर वहां पर रंगोली बनाएं. इसके बाद एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु का चित्र या फिर उनकी मूर्ति को स्थापित करें. अगर आपके पास शालिग्राम हैं तो उन्हें भी वहीं पर स्थापित करें.
भगवान विष्णु को किस मंत्र से जगाएं?
पूजा के बाद जरूर करें श्री हरि की आरती
इसके बाद उसे शुद्ध जल से पवित्र करें और उन्हें चंदन, रोली, आदि से तिलक लगाएं और उन्हें नये वस्त्र, जनेउ आदि अर्पित करें. इसके बाद श्री हरि को फल-फूल, मिष्ठान आदि भोग में अर्पित करें. इसके बाद श्री हरि को योगनिद्रा से जगाने के लिए
'उत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पतये,
त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्'
मंत्र को श्रद्धापूर्वक पढ़ें और उनके आगे 11 दीप जलाकर एकादशी व्रत की कथा का पाठ करें.
देवउठनी एकादशी के दिन भगवान श्री विष्णु की महिमा का गान करने वाले श्री विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना भी अत्यंत ही शुभ और पुण्यदायी माना जाता है. श्री हरि की पूजा के अंत में उनकी आरती करना बिल्कुल न भूलें. आरती के दौरान शंख और घंटी जरूरी बजाएं. देवउठनी के दिन श्री हरि के जागने पर महिलाओं द्वारा मंगल गान की भी परंपरा है.
इस दिन न करें ये काम
क्रोध, वाद-विवाद या नकारात्मक विचारों से बचें :
देवउठनी एकादशी Dev Uthani Ekadashi मन और आत्मा को शुद्ध करने का दिन है। क्रोध, वाद-विवाद, ईर्ष्या या गपशप में लिप्त होना आपकी आध्यात्मिक ऊर्जा को भंग कर सकता है और व्रत के पुण्य को नष्ट कर सकता है। हिंदू शास्त्रों में भक्तों को शांत रहने, क्षमा करने और भगवान विष्णु के नाम का जाप करने पर ध्यान केंद्रित करने का सुझाव दिया गया है। आध्यात्मिक शांति के लिए विष्णु सहस्रनाम या भगवद् गीता का पाठ करने की अत्यधिक अनुशंसा की जाती है।
दिन में न सोएं :
देवउठनी एकादशी व्रत Dev Uthani Ekadashi Vrat के दिन दिन में सोना अशुभ माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि दिन में सोने से व्रत और पूजा-पाठ का पुण्य कम हो जाता है।
इसके बजाय, दिन भर प्रार्थना, भजन या दान-पुण्य में व्यतीत करना चाहिए। कई भक्त भगवान को प्रसन्न करने के लिए रात में जागकर विष्णु कीर्तन भी करते हैं, क्योंकि यह उनके दिव्य जागरण के स्वागत करने का प्रतीक है।स्नान या प्रातःकालीन पूजा के बिना दिन की शुरुआत न करें :
देवउठनी एकादशी व्रत Dev Uthani Ekadashi Vrat के पवित्र दिन तन और मन की पवित्रता आवश्यक है। प्रातः कालीन स्त्रान न करने या पूजा-पाठ की उपेक्षा करने से दिन की पवित्रता कम हो सकती है। भक्तों को सलाह दी जाती है कि वे जल्दी उठें, सूर्योदय से पहले पवित्र स्नान करें और भगवान विष्णु को तुलसी के पत्ते, ले फूल, धूप और मिठाई अर्पित करें। ओम् नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करने से शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक उत्थान प्राप्त होता है।
अनाज या मांसाहारी भोजन का सेवन न करें :
देवउठनी एकादशी व्रत Dev Uthani Ekadashi Vrat के सबसे महत्वपूर्ण नियमों में से एक है अनाज, दाल, चावल या मांसाहारी भोजन का सेवन न करना। शास्त्रों में वर्णित है कि इस दिन अनाज में राक्षस निवास करते हैं और इन्हें खाने से व्रत का पुण्य नष्ट हो जाता है। अगर कोई व्रत नहीं भी कर रहा है, तो उसे हल्का और शुद्ध सात्विक भोजन जैसे फल, दूध और मेवे खाने की सलाह दी जाती है। इस दिन शराब या तंबाकू का सेवन भी अत्यंत अशुभ माना जाता है।
तुलसी और गायों का अनादर न करें :
तुलसी का पौधा और गाय भगवान विष्णु से गहराई से जुड़े हैं। देवउठनी एकादशी पर, कई घरों और मंदिरों में तुलसी विवाह (तुलसी और भगवान विष्णु के प्रतीक शालीग्राम का विवाह) किया जाता है।
इस दिन तुलसी और गायों का अनादर या उपेक्षा करना घोर पाप माना जाता है। भक्तों को तुलसी के पौधे को जल देना चाहिए और उसकी पूजा करनी चाहिए, उसके पास दीपदान करना चाहिए और गायों को गुड़ और हरा चारा खिलाकर ईश्वरीय आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।
होती है शुभ कार्यों की शुरुआत
देवउठनी एकादशी Dev Uthani Ekadashi न केवल भगवान विष्णु की पूजा का समय है, बल्कि यह शुभ कार्यों की शुरुआत का संकेत भी देती है। इस दिन विवाह, गृह प्रवेश और अन्य धार्मिक अनुष्ठान करना। अत्यंत शुभ माना जाता है।
देवउठनी एकादशी तुलसी विवाह कब है?
तुलसी विवाह हिन्दू धर्म के अनुयायीयों द्वारा किया जाने वाला एक औपचारिक विवाह कार्यक्रम है जिसमें तुलसी नामक पौधे का विवाह शालीग्राम अथवा विष्णु अथवा उनके अवतार कृष्ण के साथ किया जाता है। हिन्दू धर्म में इसे मानसून का अन्त और विवाह के लिये उपयुक्त समय के रूप में माना जाता है।

देवउठनी एकादशी के अगले दिन तुलसी विवाह होता है। एकादशी व्रत 1 नवंबर को होगा और पारण तथा तुलसी विवाह 2 नवंबर को है।
🌸 देवउठनी एकादशी पर Google FAQs (हिंदी में)
❓ देवउठनी एकादशी 2025 में कब है?
उत्तर: साल 2025 में देवउठनी एकादशी (प्रबोधिनी एकादशी) सोमवार, 3 नवंबर 2025 को मनाई जाएगी। यह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को पड़ती है।
❓ देवउठनी एकादशी का क्या महत्व है?
उत्तर: देवउठनी एकादशी को भगवान विष्णु के चार महीने के योग निद्रा से जागरण का दिन माना जाता है। इस दिन से शुभ कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन संस्कार आदि दोबारा शुरू किए जाते हैं। इसे प्रबोधिनी एकादशी या देवोत्थान एकादशी भी कहा जाता है।
❓ देवउठनी एकादशी पर क्या नहीं करना चाहिए?
उत्तर: इस दिन झूठ बोलना, मांस-मदिरा का सेवन करना, झगड़ा या निंदा करना अशुभ माना जाता है। व्रत करने वाले व्यक्ति को पूरे दिन सात्विक आहार रखना चाहिए और भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए।
❓ देवउठनी एकादशी पर कौन-सा व्रत रखा जाता है?
उत्तर: इस दिन एकादशी व्रत रखा जाता है। भक्त निर्जला या फलाहार व्रत रखते हैं और रात भर भगवान विष्णु का जागरण करते हैं। अगले दिन द्वादशी पर व्रत का पारण किया जाता है।
❓ देवउठनी एकादशी पर कौन-सी पूजा करनी चाहिए?
उत्तर: इस दिन भगवान विष्णु को तुलसी पत्र, पंचामृत, फूल, दीपक और शंख से पूजा की जाती है। तुलसी विवाह (Tulsi Vivah) भी इसी दिन या अगले दिन किया जाता है।
❓ देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह में क्या संबंध है?
उत्तर: देवउठनी एकादशी के दिन ही भगवान विष्णु योग निद्रा से जागते हैं और तुलसी माता से विवाह करते हैं। इसलिए इसे तुलसी विवाह का दिन भी कहा जाता है, जो धार्मिक दृष्टि से बहुत शुभ माना जाता है।
❓ देवउठनी एकादशी पर कौन-से शुभ कार्य आरंभ किए जाते हैं?
उत्तर: इस दिन से विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, यज्ञोपवीत, अन्नप्राशन जैसे सभी शुभ संस्कार दोबारा शुरू किए जाते हैं, क्योंकि देवताओं का जागरण इस दिन होता है।
❓ देवउठनी एकादशी की पूजा विधि क्या है?
उत्तर:
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प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें।
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भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर को पीले वस्त्र पहनाएं।
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दीपक जलाएं और तुलसी पत्र अर्पित करें।
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“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें।
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शाम को तुलसी विवाह आयोजित करें और आरती करें।
❓ देवउठनी एकादशी को किन नामों से जाना जाता है?
उत्तर: इसे प्रबोधिनी एकादशी, देवोत्थान एकादशी, उठाव एकादशी और तुलसी विवाह एकादशी नामों से भी जाना जाता है।
❓ देवउठनी एकादशी का धार्मिक संदेश क्या है?
उत्तर: यह दिन हमें सिखाता है कि जब भगवान भी विश्राम के बाद पुनः जगकर सृष्टि के कार्य आरंभ करते हैं, तो हमें भी अपने जीवन में नई शुरुआत करने का संकल्प लेना चाहिए। यह भक्ति और सकारात्मकता का पर्व है।


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