स्वामी विवेकानंद विदेश यात्राओं के दौरान वहां के लोगों को भारतीय संस्कृति के बारे में छोटी-छोटी घटनाओं से बड़ी सीख दिया करते थे। एक बार वह किसी देश में भ्रमण करते हुए एक पुल के नजदीक रूक गए। उन्होंने देखा कि पुल पर खड़े कुछ युवक नदी में तैर रहे अंडों के छिलकों पर बंदूक से निशाना लगाने का अभ्यास कर रहे थे। उनमें एक अघोषित प्रतियोगिता चल रही थी कि कौन सही निशाना लगाता है। किसी भी युवक का निशाना सही नहीं लग रहा था।
स्वामी विवेकानंद उन युवकों के बीच गए। उन्होंने एक युवक से बंदूक ली और निशाना लगाने लगे। उन्होंने अंडे के छिलकों पर पहला निशाना लगाया और वह बिल्कुल सही लगा। फिर एक के बाद एक उन्होंने कुछ दस निशाने लगाए और सभी बिल्कुल सटीक लगे। यह देख
वहां उपस्थित युवक हैरान रह गए। उन्होंने पूछा, "स्वामी जी, भला आप यह कैसे कर लेते हैं? आपके सारे निशाने बिल्कुल सटीक लग गए। आपने यह कला कहां सीखी ?"
स्वामी जी बोले, "जिंदगी में असंभव कुछ भी नहीं है, लेकिन असंभव को संभव बनाने के लिए एकाग्रता, तन्मयता और पुरूषार्थ की जरूरत होती है। तुम भी मेरी ही तरह हर निशाना सफलतापूर्वक लगा सकते हो, लेकिन इसके लिए तुम्हें एकाग्र होना होगा, अपना पूरा ध्यान निशाने पर केंद्रित करना होगा। दिमाग को उस समय उसी एक काम, यानी निशाने पर लगाना होगा। अगर तुम किसी चीज पर निशाना लगा रहे हो तो तुम्हारा पूरा ध्यान सिर्फ अपने लक्ष्य पर होना चाहिए। इसी तरह अगर तुम लोगों ने जीवन में कोई लक्ष्य बनाया है, तो अपना पूरा ध्यान अपने लक्ष्य पर ही केंद्रित रखो।


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