भारत भूमि पर प्रत्येक माह-चक्र में एक विशेष पूर्णिमा तिथि होती है, लेकिन कार्तिक मास की पूर्णिमा का स्थान धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अति-विशिष्ट है। इस दिन को हम कई नामों से जानते हैं – जैसे “कार्तिक पूर्णिमा”, “देव-दीपावली”, “त्रिपुरी पूर्णिमा”, “त्रिपुरारी पूर्णिमा” आदि।
यह दिन केवल एक व्रत-त्योहार भर नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि, प्रकृति से जुड़ाव व सामाजिक एकता का प्रतीक भी है। इस ब्लॉगपोस्ट में हम विस्तार से जानेंगे कि कार्तिक पूर्णिमा कब होती है, इसका इतिहास क्या है, किन-किन स्थानों पर कैसे मनाई जाती है, पूजा-विधि क्या होती है, और इस दिन के महत्व को कैसे समझा जाए—साथ ही ब्लॉग को SEO-अनुकूल बनाने के लिए कुछ सुझाव भी देंगे।
कार्तिक पूर्णिमा कब है? (तिथि व मुहूर्त)
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हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को कार्तिक पूर्णिमा मनाई जाती है।
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मुहूर्तों में स्नान का समय, दीपदान का समय और पूजा-समय अलग-अलग क्षेत्र अनुसार बदल सकता है। श्रद्धालुओं को स्थानीय पंचांग या मंदिर की सूचना अवश्य लेनी चाहिए।
कार्तिक पूर्णिमा का mythological व ऐतिहासिक महत्व
मिथक-कथाएँ
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एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, इस दिन भगवान शिव ने असुर राजा त्रिपुरासुर को उसके तीन राजसंगठनों (‘त्रिपुरा’) में मारा था। इसलिए इसे “त्रिपुरी पूर्णिमा” या “त्रिपुरारी पूर्णिमा” भी कहा जाता है।
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एक अन्य कथा में, इस तिथि को भगवान विष्णु के मत्स्यावतार से भी जोड़ा जाता है।
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Odisha में, इस दिन “बोइता बंद बाना” जैसे समुद्री व्यापार-परंपरा से जुड़े उत्सव भी मनाए जाते हैं, जो प्राचीन समय में काले महासागर-व्यापार से संबंधित थे।
सांस्कृतिक एवं सामाजिक महत्व
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इस दिन स्नान, दीपदान एवं दान-पूजा का विशेष महत्व है—कहा जाता है कि गंगा-स्नान आदि से पाप धुल जाते हैं।
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North India में इसे “देव-दीपावली” कहा जाता है—देवताओं द्वारा मनाई जाने वाली दिवाली की तरह।
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व्यापारिक एवं सामाजिक मेलजोल का अवसर भी है—उदाहरणस्वरूप राजस्थान के पुष्कर मेला का समापन इसी दिन होता है।
क्या-क्या विशेष आयोजन होते हैं? (उत्सव एवं रीति-रिवाज)
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स्नान व दीपदान: इस दिन प्रातःकाल स्नान करना शुभ माना जाता है, विशेष रूप से पवित्र नदियों-तालाबों में। उसके बाद दीपक जलाना।
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दीपावली जैसा स्वरूप: घर-दरवाजों, मंदिरों, घाटों में दीप जले जाते हैं—विशेष रूप से वाराणसी में गंगा घाटों पर रोशनाई होती है।
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विशेष मेले: जैसे पुष्कर मेला (राजस्थान) जिसमें हजारों ऊँट, गाय-भैंस, व्यापारी इकट्ठा होते हैं।
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ओड़िशा का बोइता बंद-बाना: लोग छोटे-छोटे कागजी, ताड़ के छाल के नौके बना कर जल में छोड़ते हैं, यह उनके पूर्वजों के समुद्री व्यापार का प्रतीक है।
पूजा व व्रत-विधि (कैसे करें)
व्रत तथा तैयारी
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व्रत रखने वाले सूखे व निराहार व्रत करते हैं या हल्का-फुल्का भोजन करते हैं।
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पूजा से पूर्व स्वच्छ स्नान करें।
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भगवान शिव-विष्णु, माता लक्ष्मी-तुलसी एवं दिव्य दीप-पूजा करें।
पूजा-विधि
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स्नान के बाद मंदिर या पूजा-स्थान में पहुँचें।
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भगवान विष्णु व शिव के सामने दीपक (गहरी) जलाएँ।
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तुलसी-पौधे के समक्ष श्रद्धा से जल, अक्षत, पुष्प अर्पित करें।
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संध्याकाल में दीपदान, आरती एवं भजन-कीर्तन देकर उपवास खोलें।
दान एवं भक्ति
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इस दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व है—वस्त्र, खाद्य सामग्री या दीपदान करना शुभ माना जाता है।
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प्रवृत्ति से जुड़ी बातें जैसे “गंगा-स्नान” विशेष पुण्यदायी माना जाता है।
किन-किन स्थानों पर विशेष रूप से मनाया जाता है?
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वाराणसी (विंध्यप्रदेश): गंगा घाटों पर लाखों दीपों की रोशनी—“देव-दीपावली” का दृश्य अद्भुत।
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पुष्कर, राजस्थान: प्रसिद्ध पुष्कर मेला इसी दिन समापन-सप्ताह में होता है।
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ओड़िशा: बोइता बंद-बाना के रूप में बहुत विशिष्ट।
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दक्षिण भारत: वहां इसे “कार्थिक दीपम” आदि नामों से मनाया जाता है—घर-आंगन दीपों से जगमगाते हैं।
आधुनिक संदर्भ व उपयोगिता
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आज-कल सोशल मीडिया पर इस दिन की तस्वीरें, दीपों की रोशनी और घाटों का दृश्य वायरल होते हैं, जिससे त्योहार-जागरुकता बढ़ रही है।
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पर्यटन दृष्टि से यह दिन विशेष अवसर लेकर आता है—अजनबी राज्य-राज्य से लोग उत्सव देखने आते हैं।
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पर्यावरण-चेतना के साथ “प्लास्टिक मुक्त दीपदान” जैसे पहलें भी शुरू हुई हैं।
निष्कर्ष
कार्तिक पूर्णिमा केवल एक रमणीय पूर्णिमा तिथि नहीं है—यह हमारे धार्मिक-सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है, जहाँ दीप की रोशनी, स्नान की पवित्रता, दान-भक्ति का भाव, एवं सामाजिक एकता मिलकर एक दिव्य वातावरण बनाते हैं। इस दिन अगर हम मन से पूजन करें, प्रकृति-जल में स्नान करें, और सच्चे मन से दीप जलाएँ, तो न केवल हमारी आत्मा को शांति मिलेगी, बल्कि हम अपनी परंपराओं से भी जुड़ सकेंगे।
आइए, इस वर्ष भी कार्तिक पूर्णिमा को संजीदगी, भक्ति व श्रद्धा के साथ मनाएं—और दिव्य रोशनी का अनुभव करें।


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