
एक युवक वन की तरफ जा रहा था। रास्ते में उसे एक महात्मा मिले तो वह उन्हें प्रणाम कर आशीर्वाद मांगने लगा। महात्मा ने पूछा. "तुम कौन हो और वन की तरफ क्यों जा रहे हो ?"
वह बोला, "मेरा मन घर में नहीं लगता इसलिए भक्ति करने वन में जा रहा हूं। भगवान को पाना चाहता हूं।" फिर महात्मा ने पूछा, "घर में कौन कौन हैं?"
युवक बोला, "घर में वृद्ध माता पिता है।"
महात्मा हंस कर बोले, "बेटा तुम वनों में रह कर समय हो बर्बाद करोगे क्योंकि असली भगवान तो तुम्हारे घर में हैं। मां बाप से बड़ा कोई भी गुरु या भगवान नहीं। उनकी सेवा करके
तुम सब कुछ पा सकते हो। तुम्हें यह संसार दिखाने वाले, पालने वाले से बड़ा कौन हो सकता है? जाओ घर लौट जाओ। बनों में कुछ भी प्राप्त नहीं होगा।"
युवक कुछ सोच कर वापस जाने लगा तो महात्मा ने उसे खुश होकर आशीर्वाद दिया व कहा " श्रवण कुमार भी यदि ऐसा ही सोचता तो उसे पाप ही लगता लेकिन उसने माता-पिता की जी भर सेवा की व संसार में अमर हो गया क्योंकि माता-पिता के दिल से निकले वचनों को स्वयं भगवान भी काट नहीं सकते। गणेश जी ने माता-पिता की सेवा से ही ढेरों वरदान प्राप्त किए। उनको ही अपना संसार माना। यदि तुम वन में ही जाने की जिद करते तो मैं तुम्हें आशीर्वाद कभी न देता। जाकर उनकी सेवा करो।"
माता पिता से बड़ी दौलत संसार में कोई नहीं। यदि उनकी उपेक्षा करके हम मंदिरों, तीथों पर जाते हैं, गंगा में स्नान करते हैं तो कोई फल हमें प्राप्त नहीं होगा, उल्टे दोष ही लगेगा।
जिस व्यक्ति ने जीते जी ही माता बिता को खूब सेवा कर ली. उनका आशीर्वाद प्राप्त कर लिया, उससे बड़ा धनवान दुनिया में कोई दूसरा नहीं हो सकता। उसे बाद में ब्राद्ध आदि करने की भी जरूरत नहीं।
जिसने मां बाप की सेवा नहीं की उन्हें पानी खाना तक नहीं दिया, छोटी-छोटी वस्तु के लिए भी तरसाया उन्हें घर से भी निकाल दिया, यह बाद में चाहे कितनी पूरी खीर बांट ले. उसे कोई भी पुण्य नहीं मिल सकता। वह समय आने पर इसका दंड अवश्य ही भुगतता है। उस वक्त सिवाय पश्चाताप के वह क्या कर सकता है।
हम श्रीराम की पूजा तो करते हैं लेकिन उनके दिखाए रास्ते पर नहीं चलते। उनके आदशों को नहीं अपनाते जो सौतेली माता के कहने पर खुशी-खुशी 14 वर्ष के लिए वनों में चले गए। आज जन्म देने वाली सगी मां भी सड़कों पर या किसी वृद्धाश्रम में धक्के खाने को मजबूर हो रही है।
एक वृद्धाश्रम के उद्घाटन के लिए गांधी जी को न्यौता दिया गया तो उन्होंने इंकार कर दिया। वह बोले. "यदि कोई वृद्धाश्रम बंद हो रहा हो तो वहां में स्वयं ही पहुंच जाऊंगा।"
आज यदि माता-पिता की सेवा व देखभाल करने के लिए कानून बनाने पड़ रहे हैं तो इसके लिए जिम्मेदार भी उपेक्षा करने वाले ही हैं। इनमें से केरल में सबसे ज्यादा भारत में 1500 से ज्यादा वृद्धाश्रम हैं। वैसे माता-पिता का कर्ज तो कोई चुका नहीं सकता लेकिन उनकी सेवा करके उन्हें खुशी तो दे ही सकता है।
वह घर जिस घर में बुजुर्गों को सम्मान मिलता है, प्यार मिलता है स्वर्ग से भी सुंदर है। वहां दुख व मुसीबत प्रवेश ही नहीं कर सकती।


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