
पहला बच्चा आपको अनजाने क्षेत्र में लेकर जाता है, जहां आपके लिए लगभग सब कुछ नया होता है। साथ ही हार्मोनल अस्थिरता, नवजात शिशु की देखभाल करने का तनाव, सामाजिक अपेक्षाओं पर खरा उतरने की कोशिश और अपने शारीरिक बदलाव को ठीक से न जानने के कारण यह दौर कठिन और थकाऊ होता है। जीवन के नए दौर में आपकी मदद करने के लिए कुछ टिप्स दे रहे हैं. ताकि आपका यह सफर आसान हो सके।
जरूरी नहीं हर काम में परफैक्ट हौं
परफैक्ट या आदर्श मां बनने के बारे में अधिक न सोचें। बच्चे की छोटी-छोटी गतिविधियों में शामिल हों, यह आपको खुश रखेंगी। थोड़ा लंबे समय तक स्नान करें, पहले की तरह ही शांति से दोपहर का भोजन करें और बैठते समय अपने पैर ऊपर रखें, इससे आप रिलैक्स महसूस करेंगी।
शिशुओं को आपकी देखभाल की जरूरत होती है, लेकिन लगातार उनके चारों तरफ घूमने की जरूरत नहीं। बच्चों का रोना स्वाभाविक है और अगर आप उन्हें तुरंत खुश या शांत नहीं करा पा रहे हैं तो माता-पिता के रूप में इसे अपनी विफलता न समझें।
आपको जो भी मदद मिल सकती है, लें साथी, परिवार, दोस्त या कोई भी जो आपको मिल सकता 'इ, क्योंकि एक बच्चे के पालन-पोषण के लिए एक बड़े परिवार की आवश्यकता होती है !
प्रसव के बाद के तनाव से नावधान रहें
प्रसव के बाद की अवधि में होने वाला तनाव, अक्सर शांत होता है और इसे गंभीरता से नहीं लिया जाता है, लेकिन यह जरूरी है कि आप इसे ध्यान में रखें। कोशिश करें और अपनी भावनाओं को समझें और जरूरत से ज्यादा न सोचें।
इसके लिए अपने चिकित्सक और दोस्तों से बात करें और पता लगाएं कि इस सोच से निपटने में आपको उनसे क्या मदद मिल सकती है।
मातृत्व को खुल कर जिएं
हम जैसी मां बनने के बारे में सोचती हैं, वह अक्सर उस मां से बहुत अलग होती है जो हम बन पाती हैं और यही वह सच्चाई है। जिसे हमें स्वीकार करने की जरूरत होती है। मां बनने का रास्ता बहुत कठिन होता है, इससे आपकी पहचान भी बदलती है। अपनी दैनिक गतिविधियों को दोबारा निर्धारित करने से लेकर बच्चे की भलाई के बारे में हर निर्णय लेने तक और जिंदगी को दोबारा पहले की तरह पटरी पर ला पाने में समय लगता है। इसलिए हड़बड़ाएं नहीं, समय दें और मातृत्व को खुल कर जिएं।

- समय का ध्यान रखें: शुरुआती दिनों में बच्चे को हर 2 से 3 घंटे में दूध पिलाना ज़रूरी है, भले ही इसके लिए आपको उसे नींद से जगाना पड़े।
- डकार दिलाएं: दूध पिलाने के बाद बच्चे को कंधे से लगाकर या अपनी गोद में बैठाकर पीठ पर हल्के हाथों से थपथपाएं ताकि उसे डकार आ जाए। इससे गैस और पेट दर्द की समस्या नहीं होती
- बार-बार डायपर बदलें: बच्चे का डायपर हर 2-3 घंटे में या गीला होने पर तुरंत बदलें। डायपर रैश से बचने के लिए साफ करने के बाद कुछ देर हवा लगने दें。
- नाभि की देखभाल: जब तक बच्चे की नाभि का हिस्सा (अंबिलिकल स्टंप) अपने आप सूखकर गिर न जाए, उसे सूखा और साफ रखें。
- तुलना न करें: हर बच्चा अलग होता है और उनकी ग्रोथ का समय भी अलग होता है। किसी और बच्चे से अपने बच्चे की तुलना न करें।
- दोष-भावना (Mom Guilt) से बचें: शुरुआती दौर में गलतियां होना सामान्य है। खुद को माफ करें और परफेक्ट बनने का दबाव न लें
- हमेशा पीठ के बल सुलाएं: SIDS (सडन इन्फेंट डेथ सिंड्रोम) के खतरे को कम करने के लिए बच्चे को हमेशा पीठ के बल लिटाएं।
- कंबल/तकिया न रखें: बच्चे को हमेशा सपाट और साफ बिस्तर पर सुलाएं। पालने या बिस्तर पर तकिए, भारी कंबल, या खिलौने न रखें, इससे सांस लेने में दिक्कत हो सकती है
- हल्की मालिश: बच्चे की तेल से हल्की मालिश करें (हड्डियों को नुकसान न पहुंचे)। अगर सर्दी-जुकाम या पेट दर्द हो, तो गुनगुने नारियल तेल में थोड़ा हींग या अजवाइन मिलाकर तलवों और नाभि पर लगा सकती हैं。
- स्पंज बाथ: जब तक नाभि का हिस्सा सूख न जाए, तब तक बच्चे को गुनगुने और मुलायम कपड़े से पोंछें (स्पंज बाथ दें)।

- आराम करें: बच्चा जब सोए, तब आप भी थोड़ा आराम कर लें। एक नई माँ के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहना बहुत ज़रूरी है。
- मदद मांगें: घर के कामों या बच्चे को संभालने में अपने पति, परिवार या दोस्तों से मदद लेने में बिल्कुल संकोच न करें।


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