

सामाजिक अपराध है बच्चियों को न सिखाना 'गुड टच-बैड टच'
आज के समय में यदि किसी एक शिक्षा को अनिवार्य घोषित किया जाना चाहिए, तो वह है- 'गुड टच' और 'बैड टच' की शिक्षा। यह केवल बच्चियों की सुरक्षा का प्रश्न नहीं है, बल्कि समाज की नैतिकता, संवेदनशीलता और ईमानदारी की सीधी परीक्षा है। हम अपने बच्चों को औपचारिक शिक्षा तो दे रहे हैं, परंतु उन्हें यह नहीं सिखा पा रहे कि अपने शरीर, अपनी सीमाओं और अपनी गरिमा की रक्षा कैसे करें। यही हमारी सबसे बड़ी चूक है और अपराधी इसी चूक को अपना अवसर बना लेते हैं।
खतरा बाहर से कम, भीतर से अधिक
हमारा समाज गहरे दोहरेपन में जी रहा है। एक ओर हम 'संस्कार' का पाठ पढ़ाते हैं, दूसरी ओर बच्चों से सच छिपाते हैं। बच्चियों को सिखाया जाता है- चुप रहो, बड़ों की बात मानो, सवाल मत करो। यही चुप्पी धीरे-धीरे उनके विरुद्ध सबसे खतरनाक हथियार बन जाती है। सच्चाई यह है कि खतरा बाहर से कम और भीतर से अधिक होता है, पर हम इस असहज सत्य से बचते रहते हैं।
स्थिति की गंभीरता इस तथ्य से और बढ़ जाती है कि अधिकांश मामलों में अपराधी कोई अजनबी नहीं होता। वह परिवार, पड़ोस या परिचय के दायरे में ही मौजूद होता है। बच्चियां चुप रह जाती हैं, क्योंकि उन्हें 'परिवार की इज्जत' और 'बड़ों की आज्ञा' का बोझ सिखाया गया होता है। यही वह बिंदु है जहां हमें स्पष्ट रूप से स्वीकार करना होगा- सम्मान का अर्थ अन्याय सहना नहीं है।
क्या होता है गुड टच-बैड टच ?
'गुड टच' वह स्पर्श है जिसमें सुरक्षा, स्नेह और सम्मान निहित हो- जैसे माता-पिता का स्नेह, परिवार का सान्निध्क्ष्य, शिक्षक का प्रोत्साहन या चिकित्सकीय आवश्यकता।
इसके विपरीत 'बैड टच' वह है जो बच्ची की इच्छा, मर्यादा और निजता का उल्लंघन करे- चाहे वह अनुचित स्पर्श हो, आपत्तिजनक संकेत हों या डर और लालच के माध्यम से किया गया शोषण। यह समझना आवश्यक है कि 'बैड टच' केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि कोई भी ऐसा व्यवहार है जो असहजता, भय या अपमान उत्पन्न करे।
यह शिक्षा जितनी प्रारंभिक अवस्था में दी जाए, उतनी प्रभावी होती है। अपराधी उम्र नहीं देखते, अवसर देखते हैं और अवसर वहीं मिलता है जहां अज्ञान, भय और चुप्पी हो। इसलिए बच्चों को 'न' कहना सिखाना उतना ही आवश्यक है, जितना 'हां' कहना। यदि उन्हें प्रतिरोध करना नहीं सिखाया गया, तो उनकी चुप्पी को सहमति समझ लिया जाता है और यह एक कठोर, किंतु यथार्थ सत्य है।
मौन नहीं, सबको जिम्मेदारी लेनी होगी
दुर्भाग्यवश, कई परिवारों में बच्चियों की बात को गंभीरता से लिया ही नहीं जाता। उनकी शिकायतों को 'गलतफहमी' कहकर टाल दिया जाता है। यही वह क्षण होता है जहां एक संभावित अपराध रोका जा सकता था, पर हम चूक जाते हैं। हमें यह तय करना होगा कि हमें अपनी सामाजिक छवि बचानी है या अपने बच्चों का भविष्य - दोनों एक साथ सुरक्षित नहीं रखे जा सकते।
शिक्षा संस्थान भी इस जिम्मेदारी से विमुख नहीं हो सकते। विद्यालय, महाविद्यालय और कोचिंग संस्थान केवल ज्ञान के केंद्र नहीं, बल्कि सुरक्षा के भी केंद्र होने चाहिएं। यदि इन स्थानों पर इस विषय को लेकर मौन है, तो यह मौन भी अपराध को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा देता है।
सामाजिक सभ्यता की अंतिम कसौटी
डिजिटल युग ने इस संकट को और जटिल बना दिया है। अब शोषण केवल शारीरिक नहीं, बल्कि आभासी माध्यमों से भी हो रहा है- अश्लील संदेश, निजी तस्वीरों की मांग, ब्लैकमेल। यह आधुनिक 'बैड टच' के रूप हैं, जिनसे निपटने की तैयारी हमने बच्चों को नहीं कराई है। हमने उन्हें उपकरण दिए, पर सुरक्षा का विवेक नहीं दिया।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि घटना के बाद भी समाज का दृष्टिकोण नहीं बदलता। प्रश्न अपराधी से नहीं, पीड़िता से किए जाते हैं- उसकी गतिविधियों, उसके वस्त्रों और उसके व्यवहार पर सवाल उठाए जाते हैं। यह मानसिकता न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि अपराध को संरक्षण देती है।
अब समय आ गया है कि इस विषय को 'संवेदनशील' कहकर टालना बंद किया जाए और इसे ' अनिवार्य' मानकर लागू किया जाए। हर घर में खुला संवाद हो, हर विद्यालय में नियमित और अनिवार्य सत्र हों, हर बच्ची अपनी आवाज की शक्ति को पहचान सके और हर बच्चा यह समझे कि सम्मान और सहमति क्या होती है।
क्योंकि अंततः सत्य यही है- 'गुड टच' और 'बैड टच' की शिक्षा केवल सुरक्षा का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक सभ्यता की अंतिम कसौटी है और इस कसौटी पर विलंब की कीमत हमेशा अंगली पीढ़ियां चुकाती हैं।


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