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भारतीय परिवार व्यवस्था में दादा-दादी का स्थान अत्यंत सम्मानजनक और केंद्रीय रहा है। वे केवल परिवार के वरिष्ठ सदस्य ही नहीं होते बल्कि अनुभव, संस्कार और खेह को वह पुरी होते हैं, जिसके चारों और पूरा परिवार परिवार घूमता है। बदलते समय, शहरीकरण और एकल परिवारों के बढ़ते चलन के बावजूद दादा दादी की भूमिका आज भी उतनी ही प्रासंगिक और महत्वपूर्ण है।
सबसे पहले, दादा-दादी परिवार की भावनात्मक रोड़ होते हैं। माता-पिता जहां आजीविका और जिम्मेदारियों के दबाव में रहते हैं, वहीं दादा-दादी बल्दों को निस्वार्थ प्रेम, समय और धैर्य देते हैं। उनका सानिध्य बच्चों को सुरक्षा अपनेपन का एहसास कराता है।
दादा-दादी को गोद, उनकी कहानियां और उनके साथ बिताया गया समय बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में गहरा प्रभाव डालता है।
दूसरी महत्वपूर्ण भूमिका संस्कारों और परंपराओं के संवाहक की है। दादा-दादी अपने जीवन अनुभव के माध्यम से बच्चों को नैतिक मूल्यों, सामाजिक व्यवहार और सांस्कृतिक परंपराओं से परिचित कराते हैं।
वे त्योहारों का महत्व समझाते हैं, पारिवारिक रीति-रिवाजों को जीवित रखते हैं और जीवन के छोटे-बड़े अनुभवों से सीख देते हैं। रामायण, महाभारत या लोककथाओं के माध्यम से वे बच्चों में सहर, धैर्य, करुणा और सम्मान जैसे गुण विकसित करते हैं।
दादा-दादी परिवार के लिए स्थिरता और संतुलन का प्रतीक होते हैं। पारिवारिक मतभेद या तनाव के समय वे मध्यस्य की भूमिका निभाते हैं।
अपने अनुभव और संयम से वे विवा को शांत करने, गलतफहमियों को दूर करने और रिश्तों को जोड़ने का कार्य करते हैं। उनकी उपस्थिति परिवार को एक सूत्र में बांधे रखती है और पीड़ियों के बीच सेतु का काम करती है।
की सामाजिक और व्यावहारिक बुजुर्ग होने के बावजूद दादा-दादी भूमिका भी कम नहीं होती। कई परिवारों में वे बच्चों की देखभाल में माता पिता का सहयोग करते हैं। स्कूल से लौटते बच्चों की देखरेख उन्हें पढ़ाई के लिए प्रेरित करना या जीवन के छोटे छोटे अनुभव सिखाना, इन सबमें उनकी भागीदारी अमूल्य होती है। इससे माता-पिता को मानसिक राहत मिलती है और परिवार में सामूहिकता की भावना मजबूत होती है।
दादा-दादी बच्चों को जीवन को वास्तविकताओं से परिचित कराते हैं। उन्होंने संघर्ष, अभाव, सफलता और असफलता सब कुछ देखा होता है। उनके अनुभव बच्चों को पैर्य रखना, कठिन परिस्थितियों में हार न मानना और जीवन को संतुलित दृष्टि से देखना सिखाते हैं। आधुनिक तकनीक और तेज रफ्तार जीवन में यह दृष्टिकोण बच्चों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होता है।
आज के दौर में, जब पीढ़ियों के बीच दूरी बढ़ती जा रही है. दादा-दादी की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
वे बच्चों को जड़ों से जोड़ते हैं और यह एहसास कराते हैं कि परिवार केवल साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि साथ निभाने की भावना है। वहीं, परिवार की जिम्मेदारी भी बनती है कि यह दादा-दादी को साध्थान, समय और अपनापन दे, ताकि उनका अनुभव और लेह अगली पीढ़ी तक सहज रूप से पहुंच सके।


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